Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 40, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 40, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 40 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
प्रबुद्धो ब्रह्मजगतोर्जाग्रत्स्वप्नदृशोरिव ।
रूपं जानाति भारूपं जीवन्मुक्तः प्रशान्तधीः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
जिसका कभी दर्शन नहीं होता, ऐसे पदार्थ के विषय में उपदेश की ग्रप्निद्धि कैसे 2 इस शंका
पर कहते हैं /
तत्त्वज्ञानी प्रशान्तचित्त जीवन्मुक्त पुरुष ब्रह्म और जगत् के प्रकाशस्वरूप रूप को क्रमशः ऐसे
जानता है, जैसे जाग्रत् और स्वप्न के द्रष्टा पुरुष क्रमशः उनका रूप जानते हैं, इसीलिए वह
उपदेष्टा होता है