Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 40, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 40, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 40 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
अस्वभावतनुत्वेन स्वभावस्थितिरातता ।
यदोदेति तदा सर्गो भ्रमाभः प्रतिभासते ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें अन्चय-व्यतिरेकरूप युक्ति बतलाते हैं /
जब अपरिच्छिन्न वस्तु (ब्रह्म) स्वभाव की स्थिति अविद्याकृत परिच्छेद से तथा उसके शरीररूप
से उदित हो जाती है, तब (५) यह सृष्टि भ्रम के सदृश प्रतिभासित होने लग जाती है