Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 40, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 40, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 40 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
रूपालोकमनस्कारबुद्ध्यादीन्द्रियवेदनम् ।
स्वरूपं विदुरम्लानमस्वभावस्य वस्तुनः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्वज्ञ का यह अनुभव हैं कि स्वत स्वरूप से शून्य बाह्य ऑर आभ्यन्तर वस्तुओ का
वास्तविक स्वरूप उसका स़राक्षिचेतन्य ही है, यह कहते हैं ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, बाह्य ओर आभ्यन्तर विषय तथा बुद्धि आदि
इन्द्रियों के प्रकाशक निर्मल साक्षी चैतन्य को ही विद्वान् लोग स्वरूपशून्य जगत्-वस्तु का स्वरूप
समझते हैं
सर्ग सन्दर्भ
उनतालीसर्वाँ सर्ग समाप्त चालीसवों सर्ग न तो संसारदशा में ब्रह्म का भान होता है और न ब्रह्मदशा में संसार का ही भान होता है, परन्तु जीवन्मुक्ति में क्रमशः दोनों का भान होता है, यह वर्णन ।