Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 212
ढो सौ ढसवाँ सर्ग समाप्त दो सौ ग्यारहवाँ सर्ग सिद्ध, साध्य आदि के विविध लोकों के दर्शनों के उपाय के साथ सकल जगत् ब्रह्म ही है, यह पुनः वर्णन ।
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, उस राजा के द्वारा पूजे गये मैंने वहाँ कुशद्वीप की इला…
- Verses 2–3हे मतिमानों में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, आज यहाँ अयोध्या नगरी में विद्यमान हो रहे मैंने आ…
- Verse 4जो चित्स्फुरणरूप कहा गया है, जो ब्रह्म" यों कल्पित नामवाला कहा गया हे, परात्पर कहा गया है…
- Verse 5श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, सिद्ध, साध्य, यम, ब्रह्मा, विद्याधर ओर देवताओं के लोक ओर…
- Verses 6–7श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, सिद्ध, साध्य, यम, ब्रह्मा, विद्याधर, देवताओं…
- Verse 8सिद्धां के लोक दो प्रकार के हैँ । एक तो हँ ये महदूलोक, जनोलोक, तपोलोक ओर सत्यलोक नामधारी.…
- Verses 9–16लोग स्वर्ग में जाते हँ उन साधनसम्पत्तियों से उन लोकों को चिरस्थायी बनाया है यों उनके वे ल…
- Verse 17कार्यकारण के बल से ही उसकी दूसरी सत्ता होगी, ऐसा तो कदापि संभव नहीं है, ऐसा कहते हैं। कार…
- Verse 18आकाश में जो भूत, भुवन आदि वस्तु उत्पन्न हुई सी दिखाई देती है, वह आकाश में आकाश ही उस प्रक…
- Verses 19–20वह (ब्रह्म) जैसा ही था ठीक वैसा ही रहता है उसमें किसी प्रकार का विकार नहीं आता जैसे स्वप्…
- Verses 21–29अतएव अपनी दृष्टि से व्यापारशून्य भी जीवन्मुक्त पुरुष व्यवहार में तत्पर से प्रतीत होते है…
- Verse 30हे श्रीरामचन्द्रजी, सिद्ध लोकों को भोग आदि का फल मेरे द्वारा वर्णित रीति से ही कल्पनामात्…