Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 212, Verses 19–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 212, verses 19–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 212 · श्लोक 19,20
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
बुद्धमेतन्मया ब्रह्मन्प्रकृतं तदुदाहर ।
वचो मदवबोधार्थं यदुदाहृतवानसि ॥ १९ ॥
किं तस्मिंश्चेतितेऽहंत्वे पदे संपद्यते परे ।
बुद्धवानसि शुश्रूषुर्नाहं तृप्तिमुपैमि हि ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
वह (ब्रह्म) जैसा ही था ठीक
वैसा ही रहता है उसमें किसी प्रकार का विकार नहीं आता जैसे स्वप्न में चिदाकाश अपने स्वरूप
से प्रच्युत हुए बिना स्वप्नपदार्थ का विवर्तं अधिष्ठान हे वैसे ही चिदाकाश अपने स्वरूप से प्रच्युत
या विकृत हुए बिना ही विवर्तं अधिष्ठान ही है । न तो कारण है ओर न विकारी हे । संकल्प में चित्त
जैसे आकार की कल्पना कर पर्वतलीला से उदित होता है, वास्तव में न वह पर्वत है और न वह
आकाश है, वैसे ही ब्रह्म मेँ जगत् की स्थिति हे