Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 212, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 212, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 212 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
उपदेश्योपदेशार्थं संदेहावसरेऽल्पधीः ।
यावन्न बुद्धस्तावत्त्वं भेदमभ्युपगच्छसि ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
कार्यकारण के बल से ही उसकी दूसरी सत्ता होगी, ऐसा तो कदापि संभव नहीं है, ऐसा कहते हैं।
कार्यकारण भाव से इसकी अन्य सत्ता होगी ऐसा यदि कहो तो उसकी तो यहाँ कथा ही क्या
है ? सृष्टि के आदि में प्रलय को प्राप्त हुए आकाश से अनन्त विश्व की उत्पत्ति क्या ओर कैसे संभव
है ?