Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 212, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 212, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 212 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
बोधस्य तु विबुद्धस्य न शास्त्रादि न शब्दधीः ।
न भेदबुद्धिर्नो भेदः किमप्येष प्रजापतेः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश में जो भूत, भुवन आदि वस्तु उत्पन्न हुई सी दिखाई देती है, वह आकाश में
आकाश ही उस प्रकार (उत्पन्न हुआ-सा) जँचता हे । इसलिए उसमें एकत्व-द्वित्व की कल्पना भी
दुर्लभ है कार्यकारणभाव तो बहुत दूर की बात रही, यह भाव है