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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 212, Verses 21–29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 212, verses 21–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 212 · श्लोक 21-29

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अहंत्वे सत्यथैतस्मिन्व्योमसत्ता प्रवर्तते । दिक्सत्ता कालसत्ता च भेदसत्ताभ्युदेति च ॥ २१ ॥ यदा किलेहाहमिति तदा नात्राहमित्यपि । भातीत्युदेति नाना खे स्वात्मैव द्वैतमक्रमम् ॥ २२ ॥ व्योमात्मिकानामेतासां सत्तानामभिधानधीः । भविष्यत्युत्तरं कालं तदा त्वाकाशमेव तत् ॥ २३ ॥ एतस्मिन्परिसंपन्ने दिक्कालकलनात्मनि । अहंभावे निराकारे व्योम तन्मात्रवेदिनि ॥ २४ ॥ इदमाभाति भारूपं वेदनं दृश्यनाम यत् । भूत्वा ब्रह्मैव निर्बाधमब्रह्मेव विराजते ॥ २५ ॥ ब्रह्मैव शान्तमजमेकमनादिमध्यं व्योमैव जीवकलनामिव भावयित्वा । व्योम्न्येव पश्यति निरावरणे विसारि दृश्यं स्वरूपमपि चान्यदिवाऽऽत्मवित्त्वात् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

अतएव अपनी दृष्टि से व्यापारशून्य भी जीवन्मुक्त पुरुष व्यवहार में तत्पर से प्रतीत होते है वास्तव में वे व्यवहारपरायण नहीं रहते ऐसा कहते हैँ । काष्ठ के समान मौन धारण कर रहते हुए भी ये महामति जीवन्मुक्त पुरुष कठपुतली की तरह व्यवहार करते हुए से प्रतीत होते हैँ । जेसे जल में जल से अनन्य (अभिन्न) भी तरंग, आवर्त आदि वृत्तिर्या रहती हैं वैसे ही ब्रह्म मे अनन्य (ब्रह्म से अभिन्न) सृष्टियाँ स्थित हैं । जैसे वायु में अनन्य (वायु से अभिन्न) तथा अमूर्त स्पन्दन रहता है । ओर जैसे आकाश में अनन्य तथा अमूर्तं शून्यता हे वैसे ही ब्रह्म में अनन्य तथा अमूर्त सृष्टियाँ है । जेसे संकल्पनगर निराकार होते हुए भी सामने स्थित होता हे, साकार होने पर भी निराकार ही हे वैसे ही ब्रह्म में स्थित यह जगत्‌ भी निराकार होने पर भी सामने साकार सा खडा है यों साकार होने पर भी वास्तव में निराकार ही है । यह त्रिजगत्‌ भले ही चिरकाल से अनुभूत हो और भले ही अर्थक्रियाकारी भी हो तो भी यह स्वप्ननगर के समान निराकार तथा शून्य है । जैसे संकल्पनगर के व्यवहारकाल में जो ही चित्त का संकल्प है वही संकल्पनगर है वैसे ही जो यह निर्मल ब्रह्म है वही यह दुश्यमान संसार है ओर वही जगत्‌ कहा जाता है । चिरकाल से नित्य अनुभूत भी यह जगद्रूपी पदार्थ वैसे ही कुछ भी नहीं है जैसे कि पुरुष का स्वप्न में अपना मरना स्वयं चिर अनुभूत होने पर भी कुछ है ही नहीं । जैसे स्वप्न में मरे हुए पुरुष को अपना दाह-संस्कार भी असत्‌ ही दिखाई देता है वैसे ही परब्रह्म मे दिखाई दिया जगत्‌ सत्‌ के समान भासमान होने पर भी असत्‌ ही हे । जगत्ता ओर अजगत्ता परब्रह्म के ही निर्मल शरीर हैं | जो अन्य रज्जु आदि वस्तु सर्पादि नामवाली नहीं हो सकती है वह परमार्थरूप से सत्‌ नहीं हे