Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 212, Verses 9–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 212, verses 9–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 212 · श्लोक 9-16
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एवमेतत्सदैवैतदहमाद्यपि चेतति ।
न ह्यनादेरजस्यास्य काप्यपेक्षा स्वसंविदा ॥ ९ ॥
सर्गासर्गनभोरूपं ब्रह्म सर्वत्र सर्वदा ।
न कदाचिदिदं नेदं ज्ञातं नेदं च किंचन ॥ १० ॥
पवनस्पन्दनं चन्द्रशैत्यं शून्यत्वमम्बरम् ।
ब्रह्माहंत्वमनन्यात्म न कदाचिन्न चेतति ॥ ११ ॥
सर्वदैवेदृशी सत्ता न कदाचिदनीदृशी ।
जगद्यस्मादनाद्यन्तं ब्रह्मात्मैव निरामयम् ॥ १२ ॥
केवलं त्वमबुद्धत्वाच्छब्दश्रवणवेधितः ।
अद्वये ब्रह्मबोधेऽस्मिन्द्वितामभ्युपगच्छसि ॥ १३ ॥
न कश्चित्किंचिदेवेह न कदाचिन्न चेतति ।
न कश्चिच्च तदन्यात्मा न कदाचिच्च चेतति ॥ १४ ॥
इदं त्रिभुवनाभासमीदृशं भाति सर्वदा ।
शान्तं राम समं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ॥ १५ ॥
न कदाचन जायन्ते नभसः पादपाद्रयः ।
ब्रह्मणश्च जयन्तीति मत्वा शान्तिं परां व्रज ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
लोग स्वर्ग में जाते हँ उन साधनसम्पत्तियों से उन लोकों को चिरस्थायी बनाया है यों उनके वे लोक
अनायास सिद्ध हैं, किन्तु जिन अन्य लोगों ने अनित्य आधुनिक धारणाभ्यासों से ध्यान विश्राम के
विषय में प्रयत्न किया है वे बड़े क्लेश से इन लोकों को स्थिर कर पायेंगे । सारा जगत् सदा निराकार
निर्विकार संशान्त चिदाकाश ही है जिसने जैसा दृढ निश्चय किया उसकी दृष्टि से वैसा ही स्फुरित
होता है, उससे अन्यथा नहीं होता । अनिश्चित यह जगत् भासता ही नहीं । अनिश्चित जगत् में "हे"
या “नहीं है” इस प्रकार का तर्कं ही नहीं उठता । अतएव शून्य, निराकार तथा निरोध न करनेवाला
यह जगत् परमाकाश ही हे । जो वस्तु दृढ़ निश्चय से भासती है वह चित्स्वभाव होने से भारूप-सी
भासमान दिखाई देती है । किन्तु असंविदित इस विश्व मेँ स्वभावतः चित्सत्ता ओर स्फूर्ति की व्याप्ति
नहीं है, इसलिए यह शून्य ओर निराकार है