Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 193
एक सौ इक्यानबेवाँ सर्ग समाप्त एक सौ बानबेवाँ सर्ग प्रबुद्ध हुए श्रीरामचन्द्रजी का अपने प्रबोध को श्रीवसिष्ठजी की शुभसन्निधि में जैसा यह चिन्मात्र है वैसा विस्तार से कथन |
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- Verse 1सकल सन्देहो की निवृत्ति होने से भलीभाँति बुद्ध हुए श्रीरामचन्द्रजी जैसे सोकर जागा हुआ पुर…
- Verses 2–3किन्तु आत्मतत्त्व के परिज्ञात होने पर यह सम्पूर्ण जगद्भ्रान्ति कुछ भी नहीं है। न तो यह कभ…
- Verse 4हे गुरुवर, यथार्थरूप से अपरिज्ञात यह परमाकाश ही हम लोगों की दृष्टि में संसारसदृश बन गया ह…
- Verse 5अत्यन्त सुनिर्मल चिदाकाश का ही ये लोग हैं, ये पर्वत हैं इस प्रकार द्वैतरूप से भान हुआ है…
- Verses 6–8हे भगवन्, सृष्टि के आदि में, परलोक आदि में, स्वप्न आदि में, काव्यरचना में तथा मनोराज्यआद…
- Verses 9–11हे मुनिनायक, इस भ्रान्ति की कहाँ से उत्पत्ति होती है ऐसी यदि आलोचना की जाय तो वह भी युक्त…
- Verse 12ब्रह्मन्, स्वप्न में अपने मरण के अनुभव की तरह भ्रान्ति का अनुभव मिथ्या ही है उक्त भ्रमान…
- Verse 13जैसे मृगतृष्णा जल, गन्धर्वनगर और द्विचन्द्र का भ्रम विचार करने से प्रतीत नहीं होता वैसे ह…
- Verse 14बालक के वेताल की (भूत की) तरह जाग्रतकाल में प्रत्यक्ष दिखाई देने पर भी यह भ्रान्ति यथार्थ…
- Verse 15हे मुनिवर, यह भ्रान्ति किस कारण से थी यह प्रश्न भी इसके विषय में शोभा नहीं देता । विचार क…
- Verse 16अज्ञान की असत्ता प्रमाणपूर्वक विचार से अलभ्य होने के कारण ही है, ऐसा कहते है । प्रामाणिक…
- Verse 17श्रुति आदि प्रामाणिक विचारों से सुविचारित होने पर भी जो परिच्छिन्नरूप से प्राप्त नहीं होत…
- Verses 18–20वन्ध्या के पुत्र के तुल्य उसकी सत्ता कैसे हो सकती है ? इसलिए कदापि किसी भी भ्रान्ति का सं…
- Verse 21इस धरातल में कभी कुछ भी न भासित है और न अभासित है यह सुनिर्मल शान्त ब्रह्म ही इस प्रकार ज…
- Verse 22किस प्रकार का वह परमपद स्थित रहता है ? इस प्रश्न पर उसे कहते हैं। जन्मरहित, मरणशून्य, अन्…