Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 193, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 193, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 193 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अधिगतमधिगम्यं प्राप्तमप्राप्तमन्यैगतमिदमलमस्तं वस्तुजातं समस्तम् ।
उदितमुदितबोधं तादृशं यत्र भूयोऽस्तमयसमुदयानां नाम नामापि नास्ति ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रुति आदि प्रामाणिक विचारों से
सुविचारित होने पर भी जो परिच्छिन्नरूप से प्राप्त नहीं होता वह आकाशपुष्प, खरगोश के सींग की
तरह असत् के तुल्य है