Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 193, Verses 6–8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 193, verses 6–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 193 · श्लोक 6-8

संस्कृत श्लोक

जीवस्यास्मिन्विमूढस्य परेऽपरिमितोदये । प्रस्फुरंश्चापि संसारपिशाच उपशाम्यति ॥ ६ ॥ भेदोपलब्धिर्गलति व्यवहारवतोऽप्यलम् । जडस्येवाजडस्यैव वीचेरिव जलोदरे ॥ ७ ॥ क्वाप्यज्ञानरवौ याते प्रतापाद्याकरे भृशम् । संसारसत्तादिवसो यात्यस्तं स निशागमः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

हे भगवन्‌, सृष्टि के आदि में, परलोक आदि में, स्वप्न आदि में, काव्यरचना में तथा मनोराज्यआदि में चित्‌ का ही चेत्यकी भाँति भान होता हे । अन्य दृश्य का कहाँ से संभव है ? मैं नरक में स्थित हूँ अथवा स्वर्ग मे स्थित हूँ ऐसी यदि पुरुष को भ्रान्ति हो तो उस भ्रान्ति के कारण ही उसको नरक बन्धन अथवा स्वर्ग बन्धन प्राप्त होता है, अतः स्वर्ग या नरकरूप दृश्य संविन्मय (काल्पनिक) ही है । न यह दृश्य हे, न द्रष्टा जीव है, न सृष्टि है,न जगत्‌ हे, न चिदाभास हे ओर न जाग्रत्‌, स्वप्न, सुषुप्ति आदि ही हें । जो कुछ भी यह अज्ञानियों का दृग-विषय अविद्या अथवा अविद्याकार्य है वह भी सब खरगोश के सींगवत्‌ असत्‌ है