Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 189
एक सौ सत्तासीवाँ सर्ग समाप्त एक सौ अड्जसीवाँ सर्ग जीव ब्रह्म ही है ।
17 verse-groups
- Verse 1उसकी यह उत्पत्ति उपचारतः (गौणीवृत्ति से) लिंग देह की भ्रान्ति से प्रतीत होती है, इस बात क…
- Verse 2किस रीति से जीव परम ब्रह्म से अभिन्न है यह बोध कराने के लिए उसे कहते हैं। वह कलन (चिदाभास…
- Verse 3जीव के ओपाधिक प्रवृत्तिनिमित्त ओर उनके भेदो से जनित विविध नामों को सुनाते हैं। हे श्रीराम…
- Verse 4जीवन से यानी मुख्य प्राण और कर्मेन्द्रियों के धारण से तथा चेतन से यानी ज्ञानेन्द्रियो के…
- Verses 5–6“चित्त” नाम की व्याख्या की जा चुकी हे । किन्तु विद्वानों की प्रसिद्धि से "चिती संज्ञाने"…
- Verses 7–8वह जीव प्रौढ संकल्पराशि से पुर्यष्टक (संकल्पादिभिः पूर्यन्ते इति पुर्यस्तासाम् अष्टकम्…
- Verses 9–10निराकार निर्विकार यह चिदाभासरूप जीव आतिवाहिक देह के नाम से विद्वानों द्वारा उत्पत्ति नाशव…
- Verse 11हे देहधारिय मे शरेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार यह आतिवाहिक शरीर चिदाकाशभूत चित्तशरीरवाल…
- Verses 12–13यह आतिवाहिक शरीर मोक्षसंवित्पर्यन्त जगत् में न नष्ट होता है ओर न उत्पन्न होता हे । चौदह…
- Verse 14यह चित्तमय शरीर अन्दर ओर बाहर जगतों को वैसे ही धारण करता है जैसे कि दर्पण प्रतिबिम्बो को…
- Verse 15जब महाकल्प में प्राकृत प्रलय के अन्तिम क्षण में सर्वनाश स्थिर हो जाता हे, उस समय महाशून्य…
- Verse 16तब चैतन्न परमात्मा चैतन्य का आवरण करनेवाले अज्ञानरूप निमित्त से पूर्वोक्त क्रम से आत्मा क…
- Verse 17वह जीव ही आतिवाहिक देह है, उसका जो जगदालोचनरूप आलोक है उससे प्रवर्तित कोई भाग शास्त्रों म…
- Verse 18कोई भाग सनातन, सनक, सनन्दन आदि कहा गया हे, कोई भाग ईश्वर के नाम से प्रख्यात है, कोई भाग प…
- Verse 19जिस जिस भाग में पाँच स्वेन्द्रियसंवितों का काकतालीयवत् भान हुआ वहाँ वहाँ उन इन्द्रियों क…
- Verses 20–22अत्यन्त विस्तारयुक्त इस दृश्य भ्रम के सम्पन्न होने पर कुछ भी सम्पन्न नहीं हुआ, क्योकि यह…
- Verses 23–29जगत् से सर्वथा शून्य ब्रह्मा का जगद्रूप से भान होने में दूसरा दृष्टान्त देते हैं। स्वप्न…