Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 189, Verses 20–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 189, verses 20–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 189 · श्लोक 20-22
संस्कृत श्लोक
एवमित्थं दशा राम पिण्डबन्धः क्व विद्यते ।
भ्रान्तिरेवेदमखिलं ब्रह्मैवाभातमेव वा ॥ २० ॥
न शाश्वतादन्यदिहास्ति कारणान्न कारणं तत्खलु कार्यतां विना ।
न कार्यताकारणतादिसंभवोऽस्त्यनामये तत्किमपीदमाततम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
अत्यन्त विस्तारयुक्त इस दृश्य भ्रम के सम्पन्न होने
पर कुछ भी सम्पन्न नहीं हुआ, क्योकि यह सब सर्वदृश्यशून्य आत्मा ही विस्तृत है । जन्म, विनाश
आदि शून्य परब्रह्म न आविर्भूत है ओर न तिरोभूत ह । आदि-अन्तरहित वही जब स्वरूप साक्षात्कार
से विहीन होता है तव सत् (आविर्भूत) ओर असत्के (तिरोभूत के) आकार से यानी जगद्रूप से स्थित
होता है । सूष्ष्मातिसूक्ष्म आतिवाहिक देहधारी ब्रह्म के स्वानुभव से यह प्रपंच निरन्तर कान्ता का
अनुसन्धान करनेवाले विधुर पुरुष की स्वप्नकान्ता के समान परिपुष्ट हो जाता हे