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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 189, Verses 12–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 189, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 189 · श्लोक 12,13

संस्कृत श्लोक

चिन्नभश्चेतनं त्यक्त्वा ब्रह्माहमिति पश्यति । अयं देहोऽयमाधार इति बघ्नाति भावनाम् ॥ १२ ॥ असत्ये सत्यबुद्ध्यैव बद्धो भवति भावनात् । बहुशो भावयत्यन्तर्नानात्वमनुधावति ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

यह आतिवाहिक शरीर मोक्षसंवित्‌पर्यन्त जगत्‌ में न नष्ट होता है ओर न उत्पन्न होता हे । चौदह भुवनो के निवासी होने से चौदह प्रकार के प्राणियों का एकमात्र यह प्ररोह स्थान है । ऋतु की व्यवस्था से वृक्षों में फलों की तरह लाखों संसार इस चित्तरूपी भूमि में हो गये हैं, होते हैं और होगे