Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 189, Verses 5–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 189, verses 5–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 189 · श्लोक 5,6
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
आतिवाहिक आलोकः स्वत एवानुभूयते ।
सदानवरतं तेन स एवाभाति पुष्टवत् ॥ ५ ॥
यथा स्वप्नस्य पुष्टत्वं चिरानुभवनोचितम् ।
अतिसत्यमिवाभाति स्वातिवाहिकता तथा ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
“चित्त” नाम की व्याख्या की जा चुकी हे । किन्तु विद्वानों की प्रसिद्धि से "चिती संज्ञाने" इस धातु-
व्युत्पत्ति से स्वतत्त्व चेतना से पूर्ण परमार्थवस्तु आत्मा ही चित्तपद का मुख्य वाच्य है ऐसा शास्त्रों का
विचार करनेवाले पुरुषों ने कहा है, यह अर्थ है