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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 180

एक सौ अठहत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक सौ उननासीवाँ सर्ग अतः सारा विश्व निराकार चिन्मात्ररूप से स्थित है अतः पूर्वोक्त शंका का अवसर कहाँ है, यह वर्णन ।

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  1. Verses 1–4श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार त्रिलोकी केवलशुद्ध चिन्मात्र सत्त्व…
  2. Verse 5देह, उसके अवयव आदि प्रबुद्ध (जागे हुए) पुरुष की दृष्टि से स्वप्न शरीर के समान चिन्मात्र ह…
  3. Verses 6–7प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो से सिद्ध मूर्त शरीर आदि का अपलाप केवल साहस ही है यह समझना ठीक नहीं,…
  4. Verse 8कारण के बिना कार्य नहीं होता है, ब्रह्म निर्विकार ओर अद्वितीय है अन्य कारण कोई है नहीं, अ…
  5. Verses 9–10युक्तिद्रष्टि से तो कारण के बिना उत्पन्न संवित्‌रूप लब्ध यह जगत्‌ न तो अत्यन्त असत्‌ है ओ…
  6. Verses 11–13मायावाद में तो सब अविरुद्ध है, यह कहते है । नाना ओर अनानारूप स्वत्मिक ब्रह्मपद में यथार्थ…
  7. Verse 14भिन्नसत्तावाली वस्तुओं में सत्ता की ऐक्य प्राप्ति तो लोक में भी प्रसिद्ध है यह कहते है ।…
  8. Verses 15–20व्याघ्रादि के भय की तरह परिज्ञात होते ही यह सम्पूर्णं तथा शान्त हो जाता है । एक ही संवित्…
  9. Verses 21–41अनेक दीप प्रभाओ के एकवद्‌ भान की तरह एक ही मायाशक्ति का अनेकधा भान हो सकता है, यह कहते है…