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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 180, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 180, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 180 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

वैदेहो नाम देशोऽस्ति सर्वसौभाग्यसंयुतः । स्वर्गस्याम्बरसंस्थस्य प्रतिबिम्वमिवावनौ ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

कारण के बिना कार्य नहीं होता है, ब्रह्म निर्विकार ओर अद्वितीय है अन्य कारण कोई है नहीं, अतः जगत्‌ की अनुत्पत्ति ही हे । तत्त्वदृष्टि से यों जगत्‌ के अपलाप की उपपत्ति होती है । अज्ञानी की दृष्टि से तो सृष्टि के अनादि होने से कारण परम्परा का संभव होने के कारण तथा ब्रह्म की प्रसिद्धि न होने से उत्पत्ति आदि सबकी उपपत्ति होती है । इसलिए जिसने जैसा निर्णय किया उसको वह वैसा प्रतीत होता है यों अपने अपने निश्चय के अनुसार दोनों की उपपत्ति होती है