Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 180, Verses 1–4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 180, verses 1–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 180 · श्लोक 1-4
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
इमं मे संशयं छिन्धि भगवन्भास्करं तमः ।
भुवनस्येव भावानां सम्यग्रूपानुभूतये ॥ १ ॥
कदाचिदहमेकाग्रो विद्यागेहे विपश्चिताम् ।
संसदि स्थितवान्यावत्तापसः कश्चिदागतः ॥ २ ॥
विद्वान्द्विजवरः श्रीमान्विदेहजनमण्डलात् ।
महातपाः कान्तियुतो दुर्वासा इव दुःसहः ॥ ३ ॥
स प्रविश्याभिवाद्याशु सभामाभास्वरद्युतिम् ।
उपविश्यासने तिष्ठन्नस्माभिरभिवादितः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार त्रिलोकी केवलशुद्ध चिन्मात्र सत्त्व ही है ।
इसमें अज्ञानियों द्वारा मूर्तरूप से ज्ञात भूतो का संभव ही नहीं है । इसलिए कहाँ से शरीर आदि हो सकते
हैं और कहाँ से समूर्तं वस्तु हो सकती है ? जो यह कुछ दिखाई देता हे वह अमूर्त ब्रह्म ही व्याप्त हे ।
चिदाकाश में चिदाकाश स्थित है, सकल विषमता से मुक्त शान्त ब्रह्म शान्त ब्रह्म में स्थित हे, आकाश
आकाश में स्थित है, ज्ञान ज्ञान में स्फुरित हे । जैसे जाग्रत् काल में स्वप्न संविन्मय शान्त अमूर्ताकार
रहता है वैसे ही सब कुछ संविन्मय (चिन्मात्र) शान्त होकर अमूर्ताकार से स्थित हे । आपके द्वारा कही
गई यह सप्रतिघ स्थिति कहाँ है ? जहाँ पर कि यह आपकी शंका अग्रसर हो, यह अर्थ है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ अठहत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक सौ उननासीवाँ सर्ग अतः सारा विश्व निराकार चिन्मात्ररूप से स्थित है अतः पूर्वोक्त शंका का अवसर कहाँ है, यह वर्णन ।