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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 171

एक सौ उनहत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक सौ सत्तरवाँ सर्ग पुत्र, स्त्री ओर सेवक से युक्त कर्मनामक मित्र तथा उसके गुणों का वर्णन और उसके साथ आनन्ददायक क्रीड़ा का वर्णन ।

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  1. Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, जीवन्मुक्त का कौन मित्र है, कृपया मुझसे कहिये जिसके स…
  2. Verse 2श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी,सहज स्वकर्म, लोकसंग्रह के लिए कृत शास्त्रीय स्…
  3. Verses 3–4उस मित्र के गुणों का वर्णन करते हैं। वह पिता के समान ढाढस देनेवाला हे, स्त्री के समान अका…
  4. Verses 5–6दुर्गम जंगलों में उबड़-खाबड़ मार्गों में और अनिवार्य वैर, झगड़ा-झंझट में फँसने पर उनसे उद…
  5. Verse 7वह अग्नि की उष्णता के समान, फूल की सुगन्ध के समान और सूर्य के निर्मल दिन की तरह सदा अविना…
  6. Verse 8नित्य लाड़ करने में निरत, पालन करने में सर्वथा कटिबद्ध वह सकल संकटों की प्राप्ति होने पर…
  7. Verses 9–20जैसे अग्नि सुवर्ण को शुद्ध कर देती है वैसे ही सभी अवस्थाओं में स्थित देह की वह शुद्धि करन…
  8. Verse 21श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिवर, उसके इस मित्र के स्त्री, पुत्र आदि पोष्यवर्ग कौन हैं…
  9. Verses 22–56श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे महामते श्रीरामजी, इसके स्नान, दान, तप और ध्यान नाम के चार महात्म…