Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 171, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 171, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 171 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

यदिदं भाति चिद्व्योम जगदाख्यं न तत्ततः । आकाशादिव शून्यत्वमन्यदन्यदपि स्थितम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी,सहज स्वकर्म, लोकसंग्रह के लिए कृत शास्त्रीय स्वकर्म और अपने प्रयत्न से अभ्यस्त सत्‌- शास्त्रों के अभ्यास, विचार,सत्संगति, शम, दम, तितिक्षा, वैराग्य, बाह्य ओर आभ्यन्तर शौच, सन्तोष, ईश्वर-ध्यान, संयम आदि स्वकर्म यह त्रिविध अनिषिद्ध कर्म एक ही है, उपाधिभेद से तीन नामों द्वारा पुकारा जाता हे । उक्त त्रिविध कर्म ही जीवन्मुक्त पुरुष का एक मात्र मित्र है