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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 171, Verses 5–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 171, verses 5–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 171 · श्लोक 5,6

संस्कृत श्लोक

तदाणुमात्रमपि हि दृश्यबीजं न विद्यते । किल यस्मादिदं चक्रं पुनर्मूर्तं प्रवर्तते ॥ ५ ॥ उत्पन्नमेव नैवातो मूर्तं दृश्यमिदं जगत् । वन्ध्यापुत्र इवात्यन्तमतोऽस्त्येव न दृश्यधीः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

दुर्गम जंगलों में उबड़-खाबड़ मार्गों में और अनिवार्य वैर, झगड़ा-झंझट में फँसने पर उनसे उद्धार करने के लिए सदा कटिबद्ध रहता है, सब विश्वासरूपी रत्नों की तिजोरी है तथा अनेक जन्मों के अभ्यास से अनुगत होने के कारण बाल्यावस्था से ही साथ रहता है । बाल्यकाल मेँ उसने उसके साथ धूलि के खेल खेले हैं, बाल्यावस्था से ही वह संगी-साथी बना है, अनेक दुश्चेष्टाओं का निवारण किया है तथा उसके रक्षण में पिता के समान सदा तत्पर रहा है