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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 171, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 171, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 171 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

यच्चेदं किंचिदाभाति दृश्यमित्यभितः स्थितम् । तच्चिन्मात्रं खमेवाच्छं परमेव पदं विदुः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

वह अग्नि की उष्णता के समान, फूल की सुगन्ध के समान और सूर्य के निर्मल दिन की तरह सदा अविनाभावी (विलग न होनेवाला) है यानी जैसे अग्नि से उष्णता पृथक्‌ नहीं होती, फूल से सुगन्ध नहीं बिछुड़ती तथा सूर्य से दिन अलग नहीं किया जा सकता वैसे ही वह भी उससे बिछुड़ता नहीं है