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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 171, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 171, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 171 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । संविदाकाशकचनमिदं भाति जगत्तया । वस्तुतो न जगन्नाभा न शून्यं न च संविदः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, जीवन्मुक्त का कौन मित्र है, कृपया मुझसे कहिये जिसके साथ यह (जीवन्मुक्त) क्रीडा करता है । उस मित्र के साथ जो वह क्रीडा करता है उसका क्या स्वभाव है ? वह स्वात्मस्वरूप में अवस्थिति ही हे अथवा रमणीय भोगस्थानों में विहारप्रयुक्त प्रीतिरूप है

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ उनहत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक सौ सत्तरवाँ सर्ग पुत्र, स्त्री ओर सेवक से युक्त कर्मनामक मित्र तथा उसके गुणों का वर्णन और उसके साथ आनन्ददायक क्रीड़ा का वर्णन ।