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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 153

एक सौ इक्यावन सर्ग समाप्त एक यौ बावनवाँ सर्ग अन्य मुनि द्वारा मुनिजी की स्वप्नपदार्थो की सत्यता-शंका का निवारण |

12 verse-groups

  1. Verses 1–2मुनि ने कहा : हे व्याध, यह कहकर रात्रि के समय वह मुनिमहाराज अपने विस्तर पर चुप हो गये। तद…
  2. Verse 3अन्य मुनि ने कहा : हे मुने, यदि जाग्रत्‌ वस्तु सत्‌ होती तो यह स्वप्नादि सत्‌ है यों आश्च…
  3. Verse 4जैसे स्वप्न का भान होता है वैसे ही आदि में इस जाग्रत्‌ दृश्य का भी भान होता हे । यह जाग्र…
  4. Verse 5हे व्याधमहागुरो (५) इस प्रकार दुश्यमान आज के हम लोगों के स्वप्न से भी जाग्रत्‌ के नाम से…
  5. Verse 6जाग्रतकाल में देखे गये पद ओर उसके अर्थ द्वारा बुद्धि में अपना संस्कार डालने से स्वप्नवाले…
  6. Verse 7इस प्रकार जाग्रत्‌-प्रपंच के अधिक मिथ्या होनेपर हे विभो, सारा स्वप्न सद्रूप है, यथार्थ है…
  7. Verses 8–9(&) “व्याधमहागुरो” यह सम्बोधन आपकी अपेक्षा भी मन्दबुद्धि व्याध को समाने के समय आपको उपपाद…
  8. Verse 10अन्य मुनिने कहा : हे महामते, मेरे इस आख्यान को सुनिये, मँ दूसरा आख्यान आपसे संक्षेप से कह…
  9. Verse 11हे मुने, मैं दीर्घं तपस्वी हूँ और आप अत्यन्त धार्मिक हो । मैं जब तक आप व्याधगुरु होओगे तब…
  10. Verse 12यहाँ पर स्थित हुए मुझे अनुगमन, भक्ति आदि सत्कार से आप नहीं छोड़ेंगे मैं भी आप लोगों के सा…
  11. Verses 13–17हे साधो, तदनन्तर कुछ वर्षो के बीतनेपर यहाँ तुम्हारे सब बन्धुबान्धवों का दुर्भिक्ष से विना…
  12. Verses 18–25उस वनका क्या वर्णन करूँ ? वह ताड, तमाल के पत्तों के नाच से दिशाओं को अलंकृत करेगा, उसमें…