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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 153, Verses 13–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 153, verses 13–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 153 · श्लोक 13-17

संस्कृत श्लोक

कोऽयं पदार्थसंघातः किं नामैतस्य कारणम् । अस्त्यस्मिन्स्वप्नसंदर्शे चिद्व्योमैकस्वरूपिणि ॥ १३ ॥ द्यौः क्षमा वायुराकाशं पर्वताः सरितो दिशः । चिन्मात्रनभ एवैते कचन्त्यात्मन्यवस्थितम् ॥ १४ ॥ चिच्चन्द्रिकाचतुर्दिक्कमवभासं तनोति यत् । तदिदं जगदाभाति चित्रमप्रतिघात्म खे ॥ १५ ॥ नेमेऽद्रयो न चेयं भूर्नेदं खं नायमप्यहम् । चिन्मात्रव्योमकचनमिदमाभाति केवलम् ॥ १६ ॥ पदार्थजातस्यास्य स्यात्किं नाम बत कारणम् । पिण्डग्रहे हेतुना तु विना कोऽप्यर्थसंभवः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

हे साधो, तदनन्तर कुछ वर्षो के बीतनेपर यहाँ तुम्हारे सब बन्धुबान्धवों का दुर्भिक्ष से विनाश हो जायेगा । उसी समय वैर, बल आदि से उन्मत्त हुए सीमाप्रान्त में स्थित छोटे-मोटे राजा ओं के आपसी युद्ध से इस गाँव के अधिकांश प्राणी मर जायेंगे, वचे-खुचे थोडे से जीव भी गाँव छोड़कर भाग जायेंगे उसके बाद आपस में एक दूसरे से आश्वासित अतएव दुःख का नाम निशान न जाननेवाले, शान्त विदितवेद्य (ज्ञातज्ञेय) होने के कारण दोनों एक से तथा सकल पदार्थो में निस्पृह, समान आचरणवाले हम दोनों यहीं एक निर्जन जगह में कहीं पेड़ों के झुरमुट के बीच चन्द्रमा और सूर्य के समान निवास करेगे । हमारे निवास करने से इस अरण्य मे समय बीतनेपर लता, वृक्षों का उत्तम वन उग जायेगा । वह शाल, ताल, लता के समूह से सारे भूतल को वेष्टित कर लेगा