Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 153, Verses 18–25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 153, verses 18–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 153 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
भ्रान्तिमात्रमिदं चेत्स्याद्भ्रान्तेः किं नाम कारणम् ।
द्रष्टा मन्ता च को भ्रान्तेः कारणं वा क्व कीदृशम् ॥ १८ ॥
यस्याहमवसं संविन्मात्रकं हृदयौजसि ।
असौ मया सह गतः किलाशेषेण भस्मसात् ॥ १९ ॥
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हिन्दी अर्थ
उस वनका क्या वर्णन करूँ ? वह ताड,
तमाल के पत्तों के नाच से दिशाओं को अलंकृत करेगा, उसमें खिले हुए कमल वनों द्वारा नीचे चरणों को
पकड़ने (छूने) के कारण वन्दनीय से वृक्ष फूलों से विकसित रहेंगे और मधुर ध्वनि कर रहे चकोरों के
झुण्डों से उसके लता-निकुज अत्यन्त मनमोहक रहेंगे । अधिक क्या कहूँ वह वन स्वर्ग से उतरा हुआ
नन्दनवन-सा स्थायी होगा