Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 153, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 153, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 153 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
ततस्तपस्विचर्याणामात्मज्ञानबुभुत्सया ।
मध्ये स स्वप्नजिज्ञासुः प्रक्ष्यति स्वप्नसंकथाम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
अन्य मुनि ने कहा : हे
मुने, यदि जाग्रत् वस्तु सत् होती तो यह स्वप्नादि सत् है यों आश्चर्य होना ठीक था । किन्तु जहाँपर यह
जाग्रत् दृश्य ही मिथ्याभूत है वहाँपर स्वप्न की सत्यता का क्या कहना है अर्थात् वह तो नितांत मिथ्याभूत
है