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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 153, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 153, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 153 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

इति ते सर्वमाख्यातं यथायं संसृतिभ्रमः । यथाहं यादृशश्च त्वमिह यत्ते भविष्यति ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

जाग्रतकाल में देखे गये पद ओर उसके अर्थ द्वारा बुद्धि में अपना संस्कार डालने से स्वप्नवाले आपको रात्रि में स्वप्न में स्वाप्निक शब्द ओर उसके अर्थकी प्रतीति हुई । संस्कार आदि की सामग्री होने से भले ही स्वप्न सत्य हो सकता है, किन्तु सृष्टि के आदि में प्रसिद्ध सर्गरूप स्वप्न पूर्वदृष्ट अर्थवाला होकर ही आकाश में विराजमान होता हे । यानी चिरप्रलय का महान्‌ व्यवधान होनेपर पूर्वानुभव संस्कार आदि का सर्वथा उच्छेद हो जाने से यह सर्गस्वप्न स्वप्न की अपेक्षा भी अति तुच्छ ही है । उसके बराबर भी इसका अस्तित्व नहीं है, यह उपपत्ति है, यह भाव है