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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 153, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 153, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 153 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

इति तेनाहमुक्तः सन्विस्मयाकुलया धिया । तेन सार्धं विमृश्यैतत्परं विस्मयमागतः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार जाग्रत्‌-प्रपंच के अधिक मिथ्या होनेपर हे विभो, सारा स्वप्न सद्रूप है, यथार्थ है ऐसा मेरी समझ में आता है यों मतिपद से संदिग्धता-सी सूचित करते हुए क्यों कहते हो ? स्फुटरूप से अनुभूत इस स्वगृह का अनुभव कर मेरे उपदेश से फिर स्वप्नध्यान में आपका उद्यम कैसे हुआ ? क्योकि कोई स्वप्न देखनेवाला यह स्वप्न मिथ्या है, ऐसा स्वप्न देखते समय नहीं जानता, यह तात्पर्य हे