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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 152

एक सौ पचासवाँ सर्ग समाप्त एक सौ इक्यावनवाँ सर्ग मुनि के आश्रम के साथ पूर्वोक्त दोनों शरीर भस्म कर चुकी अग्नि ओर भस्म की वायु द्वारा शान्ति तथा स्वप्न में जाग्रत्‌ की स्थिति का वर्णन।

9 verse-groups

  1. Verse 1अन्य मुनि ने कहा : मुने, वहाँपर वे दोनों शरीर, आश्रम, नगर, वे सब घर और सब पेड सबके सब अग्…
  2. Verses 2–3ओर अत्यन्त सन्ताप से जिसकी शिलातक चटक गई थी ऐसे उस आश्रम में विद्यमान तुम्हारे सोये हुए द…
  3. Verse 4उक्त अग्नि के अदृश्य होनेपर वायु पहले दीप्त फिर शीतल हुई भस्मराशि को पुष्पराशि की तरह कण…
  4. Verse 5उसके उपरान्त न मालूम वह आश्रम कहाँ गया ओर यह भी नहीं मालूम होता है कि वे दोनों शरीर कहाँ…
  5. Verses 6–7जब इस तरह आपका तथा उस प्राणी का शरीर अभाव को प्राप्त हो गया तब आप स्वप्न के भ्रम से ग्रस्…
  6. Verse 8हे मुने, इस कारण आपको वे दोनों शरीर प्राप्त नहीं हुए। आप जिसका कोई पारावार नहीं हे ऐसे स्…
  7. Verses 9–10जाग्रत और स्वप्न का भेद नहीं है, ऐसा जो पहले कहा था, उसका हमने स्पष्ट निर्देश कर दिया इस…
  8. Verse 11हैं
  9. Verses 12–18जैसे घटना घटी थी वह मैंने आद्योपान्त सम्पूर्ण आपसे कही | यदि मेरे कथन पर सन्देह हो तो आप…