Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 152, Verses 9–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 152, verses 9–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 152 · श्लोक 9,10
संस्कृत श्लोक
अथेवंवादिनस्तस्य वाक्यमाक्षिप्तवानहम् ।
पृष्टवान्व्याधगुरुता कासौ मे कथ्यतामिति ॥ ९ ॥
अन्यमुनिरुवाच ।
श्रूयतामिदमाख्यानमपरं कथयामि ते ।
संक्षेपेण महाप्राज्ञ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
जाग्रत और स्वप्न का भेद नहीं है, ऐसा जो पहले कहा था, उसका हमने स्पष्ट निर्देश कर दिया
इस आशय से कहते हैँ ।
हे सुन्दर आचरणवाले मुनिजी, इस तरह आपका यह स्वप्न ही जाग्रत् बन गया। यहाँ हम सब लोग
आपके स्वप्नपुरुष हैं आप हमारे स्वप्नपुरुष है ओर हम आपके स्वप्नपुरुष हैँ । यह चिदाकाश ही
सर्वदा (तीनों अवस्थाओं में)अद्वितीय स्वभाव में स्थित है