Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 152, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 152, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 152 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
इत्थमद्यतनात्स्वप्नात्सर्गस्वप्नोऽमलात्मकः ।
श्रृणु पुष्करपत्राक्ष मुने व्याध महागुरो ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके उपरान्त न मालूम वह आश्रम कहाँ गया ओर यह भी नहीं मालूम होता है कि वे दोनों
शरीर कहाँ गये । बहुत से लोगों का पिटारीरूप निवासस्थान वह नगर जाग्रतपुरुष के स्वप्ननगर की
तरह न मालूम कहाँ चला गया