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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 152, Verses 6–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 152, verses 6–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 152 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

अद्य दृष्टपदार्थाभ्यां स्वप्नं स्वप्नवतोऽभवत् । सर्गस्वप्नस्तु दृष्टार्थ एवादौ खे विराजते ॥ ६ ॥ एवं सत्स्वप्न इत्येव संदिग्धमिव वक्षि किम् । स्फुटमप्यनुभूतं सत्स्वप्नध्यानोद्यमः कथम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

जब इस तरह आपका तथा उस प्राणी का शरीर अभाव को प्राप्त हो गया तब आप स्वप्न के भ्रम से ग्रस्त थे ओर अब स्वप्नमय शरीररूपसे आपकी संवित्‌ स्फुरित होती हे । इसलिए (जलने के कारण) कहाँ बाहर निकलने का द्वारभूत उसका गले का छिद्र, कहाँ आपका वह विराट्‌ पुरुष प्राणी क्योकि ओज के साथ ही जले हुए उसका ओज सहित ही तुच्छ शरीर जलकर राख हो गया