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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 152, Verses 2–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 152, verses 2–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 152 · श्लोक 2,3

संस्कृत श्लोक

ततश्चिरेण कालेन मयोक्तं तस्य सन्मुने । एवं स्वप्नो विभो सर्वः सद्रूप इति मे मतिः ॥ २ ॥ अन्यमुनिरुवाच । सत्संभवति यत्रान्यत्तत्रेदं सदिति स्मयः । युक्तो यत्र त्वेतदेव सत्ताल्पं तत्र का प्रमा ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

ओर अत्यन्त सन्ताप से जिसकी शिलातक चटक गई थी ऐसे उस आश्रम में विद्यमान तुम्हारे सोये हुए दोनों शरीर भस्म हो गये । सम्पूर्ण वन को पूर्णरूप से जलाकर वह आग जैसे सारे समुद्र को पीकर अगस्त्यजी विरत हुए वैसे ही पहले अंगारमात्र शेष होकर शान्त हुई तदुपरान्त अदृष्ट हो गई