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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 147

एक सौ पैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ छियालीसवाँ सर्ग प्रस्तुत स्वप्नदर्शन के बाद मुनि महाराज का स्वसुषुप्ति वर्णनपूर्वक स्वप्न के प्रसंग से ब्रह्मअद्वैत का विस्तार से वर्णन |

16 verse-groups

  1. Verse 1प्रसंगप्राप्त स्वप्न, सुषुप्ति ओर जाग्रत्‌-भेद को चुनकर फिर अवशिष्ट पूर्वकथांश को ही व्या…
  2. Verse 2मुनि महाराज ने कहा : हे व्याध, उसके वाद उस प्राणी के ओज में बैठे हुए तथा उसके जीव से मिश्…
  3. Verses 3–12उस समय जब कि अति भयानक प्रलय का आडम्बर अपनी पूरी शक्ति के साथ कदम उठाये थे, महान्‌ पर्वतो…
  4. Verse 13सकल दृश्य का विलय होनेपर ही सुषुप्ति होती है सुषुप्ति में भी तत्युषुप्तात्मनो दृश्यात्‌"…
  5. Verse 14उत्पन्न होता है ? अन्यता का प्रयोजक जन्म क्या है, अथवा सर्वदृश्यप्रलय में अन्य सुषुप्ति क…
  6. Verse 15दृश्य और उसके जन्म आदि क्या वास्तविक हैं, ऐसा तुम पूछते हो या व्यवहारतः उनका क्या रूप है,…
  7. Verse 16पण्डितो के विचार में तो जात आदि शब्दों का सन्मात्र ही अर्थ है, दूसरा कोई अर्थ नहीं है, ऐस…
  8. Verse 17हो ऐसा, इससे प्रकृत में क्या आया ? इस पर कहते है। सत्तार्थक भू धातु भू सत्तायम्‌ यों पाणि…
  9. Verse 18ऐसी परिस्थिति में विद्वानों की दृष्टि से अज्ञानियों की दृष्टि में प्रसिद्ध जन्म आदि किसी…
  10. Verse 19इस प्रकार सर्वसत्तात्मक ब्रह्म मे अस्तित्व ओर नास्तित्व का अथवा विधि और निषेध का अवकाश नह…
  11. Verse 20तब “अस्ति” (है) “नास्ति (नहीं है) इस लोकप्रसिद्ध व्यवहार का कौन विषय है ? इस प्रकार उक्त…
  12. Verse 21तत्त्वज्ञानी तो सदा तुरीय पद में प्रतिष्ठित रहते है । अतएव उनकी जाग्रत्‌ आदि अवस्थाएँ ही…
  13. Verse 22प्रत्यक्षतः अनुभवारूढ वस्तुओ का अपलाप करना किसी प्रकार भी संभव नही है, इस शंका का दृष्टान…
  14. Verse 23तव तो जैसे स्वप्न और मनोरथ में प्राणादिमान्‌ जीव द्रष्टा है वैसे ही सर्यादि में भी प्राण…
  15. Verse 24सर्ग को स्वीकार कर उसका द्रष्टा शुद्ध है यह कहा है । वास्तव में तो द्रष्टा, दर्शन और दृश्…
  16. Verses 25–29सृष्टि के आरम्भ में चित्‌ ही सकल पदार्थ रूपसे विकास को प्राप्त हुआ है प्रलयपर्यन्त वैसे ह…