Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 147, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 147, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 147 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
येषामभ्यासयोगेन साधुसच्छास्त्रसंगमैः ।
उदेति बोधधीर्भूयो या विस्मरति नोदयम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
तव तो जैसे स्वप्न और मनोरथ में प्राणादिमान् जीव द्रष्टा है वैसे ही सर्यादि में भी प्राण आदि युक्त
ही ब्रह्म की सिद्धि होती है, निर्विशेष ब्रह्म सिद्ध नहीं हो सकता, इस पर कहते हैं।
स्वप्न ओर मनोरथ जीवोपाधिसृष्टि के उत्तरकालवर्ती हैँ, अतएव इस स्वप्नदृष्टि का द्रष्टा
प्राणादिमान् जीव हो सकता है, किन्तु चेत्यभिन्न (चेत्यसंसर्ग शून्य) चित् सृष्टि के आदि में आकाश से
भी अधिक स्वच्छ है अतएव सृष्टि के आरम्भ में प्राणादिमान् ब्रह्म कदापि सिद्ध नहीं हो सकता, किन्तु
निर्विशेष ही है, यह सिद्ध हुआ