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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 147, Verse 17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 147, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 147 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

तानेव सकलान्बन्धूंस्तथासंस्थानसंस्थितान् । तान्पुत्रांस्तां महेलां च तदेव च तदा गृहम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

हो ऐसा, इससे प्रकृत में क्या आया ? इस पर कहते है। सत्तार्थक भू धातु भू सत्तायम्‌ यों पाणिनि आदि से कहा गया है, इसलिए “प्रादुः उपसर्ग युक्त भावशब्द से संजात (उत्पन्न) प्रकट यानी "सन्‌" अर्थ कहा जाता हे । वह नित्यसिद्ध स्वप्रकाश चिदात्मा ही हे । यदि प्रादुः" शब्द का “सर्ग अर्थ मानो तिसपर भी कोई हानि नहीं है, क्योकि सर्ग शब्द का भी सृजधातु से भाव में प्रत्यय होनेपर घञ्‌के अर्थ सत्तारूप भाव में सृज्य अर्थ का अभेद से अन्वय होनेपर सत्‌ ही सर्गशब्द से कथित होता हे