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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 137

एक सौ पैंतीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ छत्तीसवाँ सर्ग भास के पूछने पर अग्नि द्वारा आदि से लेकर शव के वृत्तान्त का उसकी असुर, मच्छर, मृग ओर व्याध योनियं का - वर्णन |

12 verse-groups

  1. Verses 1–2भास ने कहा : राजन्‌, इसके बाद तोते के पंखों की जड के कोनेपर बैठे हुए देवाधिदेव भगवान्‌ अग…
  2. Verse 3अग्निने कहा : हे राजन्‌ सुनो, मैं त्रैलोक्य में प्रकाशमान असीम शवका सारा का सारा वृत्तान्…
  3. Verses 4–7सर्वव्यापक, निराकार चिन्मय परमाकाश है, जिसमें ये असंख्य जगत्रूप परमाणु हैं । उस सर्वव्याप…
  4. Verses 8–9चमक रही उस अणुता ने बढ़कर अपनी वृद्धि की (फुलाव की) भावना करते हुए चक्षु आदि इन्द्रियों क…
  5. Verses 10–13वेदन से लेकर विषयपर्यन्त अध्यारोपरूप कार्य-करणों के मध्य में असुर नाम का कोई प्राणी था, व…
  6. Verses 14–17उस समय वह आतुर वेतन कैसा था, इस पर कहते हैं। आकाशमण्डल के तुल्य निराकार निराधार चैत्यभिन्…
  7. Verses 18–19तदुपरान्त जैसे वर्षा ऋतु, पूर्वी वायु, वर्षा आदि का जल - इन सबसे अंकुर पैदा करने में सक्ष…
  8. Verse 20स्वेदज आदि चतुर्विध भूतयोनियों में उसने कौन योनि पाई और कितने काल तक की उसकी आयु हुई 2 इस…
  9. Verse 21आपने स्वप्नसंसार के समान ही जाग्रतसंसार भी है, यह एक दो नहीं, सैकड़ों बार कहा है । स्वप्न…
  10. Verses 22–26श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, ब्रह्माजी से लेकर तिनके पर्यन्त सब भूतों की दो प्रकार की उत्प…
  11. Verses 27–32ब्रह्ममय जन्म का अनुभव जन्मतः सिद्ध कपिल, सनक आदि महामुनियो को ही होता है, अज्ञानी मच्छर…
  12. Verses 33–61देखो न इस संसार की असारता ! आयु वायु से टकराए हुए मेघमण्डल में लटक रहे जल के समान क्षण मे…