Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 137, Verses 4–7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 137, verses 4–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 137 · श्लोक 4-7
संस्कृत श्लोक
विवेश मनसा मौनी ततः शास्त्रविवेकिताम् ।
दिनैरेव यथा पुष्पमामोदेन नराशयम् ॥ ४ ॥
अपृच्छन्मुनिशार्दूलं कदाचित्तमरिन्दम ।
भगवन्दृश्यते स्वप्नः कथमन्तर्बहिः स्थितः ॥ ५ ॥
मुनिरुवाच ।
ममापि साधो प्रथममेष एव विवेकिनः ।
पुरा चित्ते वितर्कोऽभूत्कुतोऽप्यभ्रमिवाम्बरे ॥ ६ ॥
तत एतद्दिदृक्षार्थमहमभ्यस्तधारणः ।
बद्धपद्मासनस्तस्यां संविद्येवाभवं स्थिरः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
सर्वव्यापक, निराकार चिन्मय परमाकाश है, जिसमें ये असंख्य जगत्रूप
परमाणु हैं । उस सर्वव्यापक, सर्वात्मक, शुद्ध, चिन्मात्र आकाश में कहींपर अपने आप विषयाकारमय
संवित् उद्भूत हुई । वेदनारूप स्वभाव होने के कारण ही उसने अपने में तेजःपरमाणुभाव वैसे ही देखा
जैसे कि तुम पथिक की भावना करते हुए सोकर स्वप्न में अपने को ही पथिक रूप से देखते हो ।
अज्ञानावृतचैतन्य होने के कारण परमाणु ने कमल में उत्पन्न पराग के कण के समान खूब चमक रही
संकल्परूप अपनी अणुता स्वयं देखी