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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 137, Verses 10–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 137, verses 10–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 137 · श्लोक 10-13

संस्कृत श्लोक

व्योमस्थचित्तवलितः स प्राणपवनो मया । अग्रस्थस्य मुखाग्रस्थे जन्तोः प्राणे नियोजितः ॥ १० ॥ यः प्राणवलितः प्राणस्तेन नीतो हृदन्तरम् । स्वेहया स्वं स्वकः सर्पः करभेणेव हिंसितः ॥ ११ ॥ ततोऽहं हृदयं तस्य प्रविष्टः प्राणवाजिना । संकटस्थः स्वया बुद्ध्या तावेबानुसरोन्तरम् ॥ १२ ॥ चरद्रसाभिर्बह्वीभिर्नाडीभिरभितो वृतम् । कुल्याभिः स्थूलतन्वीभिर्बाह्यदेशमिवाखिलम् ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

वेदन से लेकर विषयपर्यन्त अध्यारोपरूप कार्य-करणों के मध्य में असुर नाम का कोई प्राणी था, वह असुर स्वभाव से ही बड़ा अभिमानी हुआ। शका : क्या उसके माता, पिता ओर पितामह नहीं थे 2 उत्तर : थे, किन्तु विदूरथ के पिता, माता आदि के समान असत्यप्रतिभास-स्वरूप थे । वह मारे घमण्ड के फूला न समाता था, अतएव उसने वहाँपर किसी महामुनिका सुखशान्तिमिय आश्रम मटियामेट कर डाला । तब मुनिने उसे शाप दिया-अरे अधम, विशालकाय होने के कारण तूने मेरा यह आश्रम तहस-नहस कर डाला हे, इस कारण तू मरकर अतिक्ुद्र मच्छर हो । इसके उपरान्त मुनि के शापरूपी अग्नि ने उसी क्षण में उस असुर को जैसे वडवानल जल को भस्म कर देता है वैसे ही वहाँ भस्म कर दिया