Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 137, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 137, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 137 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
रसनादपरैर्नाडीमार्गविद्याधराध्वगैः ।
संचरद्भिर्वृतं वातैराकारार्धार्धगीतिभिः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
आपने स्वप्नसंसार के समान ही जाग्रतसंसार भी है, यह एक दो नहीं, सैकड़ों बार कहा है ।
स्वप्न-देह का तो योनि से जन्म नहीं दिखाई देता, जाग्रतदेह का योनि से जन्म दिखाई देता है, उसके
दृष्टान्त से जाग्रत-देह के समान ही स्वप्नदेहका भी जन्म सर्वत्र योनि से ही है अथवा दूसरे प्रकार से भी
हो सकता है यों संशय में पड़े हुए श्रीरामचन्द्रजी प्रसंगतः श्रीवसिष्ठजी से पूछते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : प्रभुवर, यहाँ सभी प्राणियों का योनि से ही जन्म होता है अथवा अन्य
प्रकार से भी हो सकता है ?