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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 137, Verses 14–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 137, verses 14–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 137 · श्लोक 14-17

संस्कृत श्लोक

पर्शुकापञ्जरप्लीहयकृद्रक्तादिडिम्बकैः । संकटं जीवसदनं भाण्डोपस्करणैरिव ॥ १४ ॥ सर्वैः शलशलायद्भिरुष्णैरवयवैर्वृतम् । निदाघतापसंतप्तैरूर्मिजालैरिवार्णवम् ॥ १५ ॥ नवं नवं बहिःशैत्यं नासाग्राच्चेतनात्मकम् । जीवनायानिशं चेतो वातोन्नीतमनारतम् ॥ १६ ॥ रक्तकुट्टरसश्लेष्मवसानिःस्रावपिच्छिलम् । घनान्धकारमुष्णं च संकटं नरकोपमम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

उस समय वह आतुर वेतन कैसा था, इस पर कहते हैं। आकाशमण्डल के तुल्य निराकार निराधार चैत्यभिन्न आसुर चेतन सुषुप्त मूच्छित चित्त के समान था। वह अव्याकृतस्वरूप आसुर चेतन, समानता होने के कारण, भूताकाश के साथ एकता को प्राप्त हुआ ओर तदनन्तर वह भूताकाश अपने में प्रतिष्ठित वायु के साथ एकता को प्राप्त हुआ। चेतनावायुरूप (प्राण रूप) वही, जिसका कि देहप्राप्ति होनेपर प्राणी" नाम पड़ेगा, अणुरूप पार्थिव भाग, अणुरूप जल भाग, अणुरूप तेज भाग और अणुरूप आकाश भाग से व्याप्त हुआ। उस पंचतन्मात्रामय अणुरूप चिन्मात्रलेश में आकाश में वायुलेश के समान स्वभावतः क्रियाशक्ति का आविर्भाव हुआ