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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 135

एक सौ तैंतीसवाँ सर्ग समाप्त एक सो चौंतीसवाँ सर्ग आविर्भूत हुई देवी कालरात्रि के शरीर का वर्णन तथा गणों द्वारा उस शव का भक्षण, जिसका कि रक्त श्रीदेवी पी चुकी थी।

12 verse-groups

  1. Verses 1–2इस बीच मेँ जब देवगण देवी की स्तुति कर रहे थे, उस पूर्वोक्त गिर रहे पुरुष ने अपने शरीर से…
  2. Verses 3–13वह शव इतना महान्‌ था तो दूरस्थित उसकी भुजाएँ, जंघाएँ ओर सिर तुमने कैसे जाने ? ऐसी आशंका ह…
  3. Verse 14देवताओं ने उस देवी से कहा : हे देवि ! अम्बिके ! इसे हमने आपको भेंट कर दिया है, कृपया अपने…
  4. Verses 15–38देववृन्द के यों प्रार्थना करनेपर देवी, स्वयं सर्वप्राणशक्ति रूप होने से तथा प्राणों के रक…
  5. Verses 39–40श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, जिस शव के अतिविशाल हस्त, पाद आदि अवयव ब्रह्माण्ड से भ…
  6. Verses 41–43इस तरह प्रश्न का उत्तर कहकर कथा का अवशिष्ट अंश भी श्रीवसिष्ठजी ही कहते हैं, जो कि भासको ज…
  7. Verse 44हा खेद है, पृथिवी कहाँ चली गई, सागर कहाँ चले गये, जनता कहाँ चली गई और पर्वतराशि कहाँ चली…
  8. Verse 45हाय, चन्दन ओर मन्दार ओर कदम्ब के वृक्षों के वनों से अलंकृत तथा विविध पुष्पों की राशियों क…
  9. Verses 46–47रुधिर ने हिम से सम्पादित शुक्लता के प्रति मानों द्रेषवश उसको नष्ट करने के लिए हिमालय के ऊ…
  10. Verse 48हे कल्पवृक्ष, लक्ष्मी, चन्द्रमा ओर अमृत को पैदा करनेवाले, हे क्षीरसागर, हे दधिसागर, जिसके…
  11. Verses 49–55हे क्रौचद्रीप, जिसमें कल्पवृक्ष ओर निर्मल कांचनलताओं से निरवच्छिन्न घनिष्ट सम्बन्ध रखनेवा…
  12. Verses 56–57की माला से सुशोभित हे, जो वृक्ष, पल्लव, अंकुर आदि भूषणो से युक्त है, जिसके सोते, नदियाँ,…