Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 135, Verses 3–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 135, verses 3–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 135 · श्लोक 3-13
संस्कृत श्लोक
द्वीपेषु सप्तस्वपि पश्य मेदोजलानि भूतैः प्रविसारितानि ।
भुक्तं च मांसं रुधिरं च पीतं किंचिद्गता संप्रति दृश्यतां भूः ॥ ३ ॥
मेदःपटैरावलिताखिलाङ्गी कष्टं स्थिता संप्रति मोदना भूः ।
मेदोमयैः शारदमेघजालैः सकम्बलानीव वनानि भान्ति ॥ ४ ॥
पञ्चैतानि तदस्थीनि संपन्नानि महाद्रयः ।
हिमाद्रिशिखराणीव स्थितान्यावार्य दिक्तटम् ॥ ५ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
देवेषु कथयत्स्वेवं कृत्वेमां मेदिनीं धराम् ।
मेदोजालैः स भूतौघो मत्तो व्योम्नि ननर्त ह ॥ ६ ॥
नृत्यत्सु भूतवृन्देषु शिष्टं रक्तं सुरैर्भुवः ।
एकप्रवाहेणैकस्मिन्निक्षिप्तं मकरालये ॥ ७ ॥
सुरार्णवं तमेवैनं संकल्पं विदधुः सुराः ।
ततःप्रभृति सोऽद्यापि संपन्नो मदिरार्णवः ॥ ८ ॥
भूतानि नृत्तमाकाशे तानि कृत्वा पिबन्ति ताम् ।
मदिरां पुनराकाशे नृत्यन्त्यानन्दमन्दिरे ॥ ९ ॥
पिबन्त्यद्यापि तानीव मदिरां मदिरार्णवात् ।
खे नृत्यन्ति च भूतानि सह योगेश्वरीगणैः ॥ १० ॥
तेषां तान्यथ भूतानां मेदोजालानि भूतले ।
विस्तृतान्यवशुष्काणि स्थितातो मेदिनी मही ॥ ११ ॥
इति क्रमाच्छान्तिमुपागते शवे पुनः प्रवृत्ते दिनयामिनीक्रमे ।
प्रजाः ससर्जाथ नवाः प्रजापतिः पुनः स सर्गोऽभवदत्र पूर्ववत् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
वह शव इतना महान् था तो दूरस्थित उसकी भुजाएँ, जंघाएँ ओर सिर तुमने कैसे जाने ? ऐसी
आशंका होनेपर वह कहता है ।
भगवान् अग्नि ने उसकी अनन्त भुजाओं, जंघाओं ओर सिर के विषय में मुझसे कहा था, जो
कि उसके भुजा आदि अवयव मनुष्यों की पहुँच के परे लोकालोक पर्वत के परले पार गिरे थे । इसके
बाद आकाशचारी सिद्धादिवृन्द के आदरपूर्वक देवी की स्तुति करनेपर देवी आकाश से प्रकट हुई,
चूँकि वह आकाश से प्रकट हुई थी, अतएव स्वयं शुष्का (रक्तहीना) थी । भूत-प्रेतों के दल के दल
उसके पीछे-पीछे चल रहे थे, षोडश मातर उसकी आवभगत में (सेवा-शुश्रुषा में) संलग्न थीं,
कूष्माण्ड, यज्ञ, वेतालो के झुण्डों से उसने आकाश को तारामण्डल से मण्डित-सा बना दिया था
तथा नसों के जल से पूर्ण बड़े-बड़े भुजदण्डों से आकाशतल को वन बना दिया था, दिशाओं में दाह
की वृष्टि करनेवाले अपने दृष्टिपातों से वह सूर्यो को बिखेर रही थी, चमचमा रहे विविध हथियारों
के आकारो से हो रही झण झण ध्वनि के साथ आकाशरूपी खोडरे में पक्षियों के झुण्ड को सैकड़ों
हिस्सों में बाँट रही थी । शरीर की ज्वालाओं ओर नेत्रवर्ती अग्नि की उष्णता से परिपूर्ण शरीर के
अवयवो से बहुत लम्बे बाँसों के वन के आकारवाली करोड़ों योजन की कान्तियाँ बिखेर रही थी ।
चाँदनी जैसी दन्तकान्तिरूपी दूध से उसने दिशाओं को धो डाला था, अपने (दुबले) पर अतिविस्तृत
शरीर से आकाश आच्छन्न कर दिया था, उसका न तो कोई आधार था ओर न स्थान ही था, अतएव
वह निराधार आकाश में फैली हुई सन्ध्याकाल की मेचपंक्ति-सी थी । परम ब्रह्म में आविर्भूत हुई
वह प्रेतासन पर बैठी थी । जगमगा रही, उज्ज्वल रूपवाली वह सन्ध्याकाल के मेघ के समान लाल
थी, अतएव आकाशरूपी सागर मे वडवानल की शोभा धारण कर रही थी । पूरे शवों से, शवों के
अवयवो से, मूसल, प्रास, तोमर, मुद्गर, आसन, ऊखल ओर हलो से बनी चंचल मालाओं को
इधर-उधर बिखेर रही थी। जैसे वर्षा ऋतु का पर्वत पत्थरों की माला को झर-झर ध्वनिवाले रनों
से अपने शरीर में धारण करता है वैसे ही वह दाँतों के कट-कट शब्द के आडम्बर से युक्त प्रजाओं
के शरीर की माला को आकाशरूपी आँगन में धारण कर रही थी