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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 135, Verses 41–43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 135, verses 41–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 135 · श्लोक 41-43

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इस तरह प्रश्न का उत्तर कहकर कथा का अवशिष्ट अंश भी श्रीवसिष्ठजी ही कहते हैं, जो कि भासको ज्ञात न था। वहाँ शिखरो की चोटियोंपर बैठे हुए अत्यन्त शुद्ध कान्तिवाले देवता शरदऋतु के सूर्य की धूप से निर्जल हुए शुभ्र मेघों के समान दिखाई देते है । जब भूतप्रेतों का दल सब अंग-प्रत्यंग छोड़कर (फैलाकर) मुँह के बल गिरे हुए उस शव को खा रहा था और सोलहों मातृकाएँ (देवियाँ) खूब नाच रही थीं, रुधिर के पनाले बह रहे थे, वसा की दुर्गन्ध फैल रही थी, प्रत्येक देवताने दुःखी होकर यह विचार किया