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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 135, Verses 39–40

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 135, verses 39–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 135 · श्लोक 39,40

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, जिस शव के अतिविशाल हस्त, पाद आदि अवयव ब्रह्माण्ड से भी बाहर, पहुँच गये, उसने लोकालोक पर्वत को केसे नहीं ढका ?॥ ३ ८॥ श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, उस शव का उदरोपलक्षित मध्यशरीर सात द्वीपों के बीच में रहा हे । सिर, खुरोपलक्षित पैर ओर बाहु आदि अवयव ब्रह्माण्ड के बाहर रहे हौ, यह जो भासने कहा वह सत्य ही है तथापि शव के दोनों बगल, जंघाओं के मध्य से, कमर के दो भागो से ओर सिर और कन्धों के दो मध्य भागों से शिखरो के न ढकने के कारण वह लोकालोक पर्वत ऊपर दिखाई देता ही है