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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 135, Verses 15–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 135, verses 15–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 135 · श्लोक 15-37

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

देववृन्द के यों प्रार्थना करनेपर देवी, स्वयं सर्वप्राणशक्ति रूप होने से तथा प्राणों के रक्तपर आश्रित होने से, प्राणवायु से ही उसका रक्तरूपी सार अनायास खींचने लगी । जैसे सन्ध्याकाल का मेघवृन्द मेरु की गुफा के अन्दर प्रविष्ट होता है वैसे ही प्राणवायु द्वारा खींचा जा रहा उस शव का रक्त भगवती के मुँह मेँ प्रविष्ट हुआ । आकाश में स्थित भगवती कालरात्रि ने प्राणवायु द्वारा खींचा गया रुधिर तब तक पीया जब तक कि पहले सूखी लकड़ी-सी वह चण्डिका तृप्त होकर मोटी तगड़ी न हो गई । तदुपरान्त रुधिर से मोटे तगड़े शरीरवाली वह जैसे वर्षा ऋतु में बिजलीरूपी चंचल नेत्रवाली मेघमाला रक्तवर्णा होती है वैसे ही बिजली की तरह चंचलनयना और लाल हो उठी। रक्त पीने से भगवती की तोंद बाहर निकल आई लम्बी तोंदवाली वह विषैले साँपरूपी आभूषणों से विभूषित थी, रक्तरूपी मदिरा के नशे मेँ चूर थी तथा सब हथियार उसने धारण कर रक्खे थे । पूर्वोक्त देवी ने अपने आधे शरीर से आच्छन्न आकाश में नाचना आरंभ किया । आस-पास के लोकालोकपर्वत की श्रेणी के शिखरो पर बैठे हुए देवगण उसका नाच देखने लगे । उसके पश्चात्‌ पिशाच, कूष्माण्ड, रूपिका आदि महागणों ने उक्त शव को चारों ओर से ऐसे घेर डाला जैसे कि मेघमाला हिमालय पर्वत को घेर डालती है । कूष्माण्डं ने उक्तशवरूपी शेल को कमर की ओर से पकड़ा, रूपिकागणों ने पेट की तरफ से उसे पकड़ा ओर यक्षं ने हाथी के-से अपने दाँतों से क्षतविक्षत अवशिष्ट पीठ ओर अगल-बगल की ओर से उसे पकड़ा । चूँकि उसके जो भुजा, जंघा, कन्धे आदि अन्य अवयव थे, वे बहुत बड़े थे और ब्रह्माण्ड के परले पार जा पड़े थे, अतएव पूर्वोक्त भूत, प्रेत, पिशाच आदि दूर दिगन्तर में पड़े हुए उन्हें नहीं पा सके, किन्तु वे वहींपर काल से अपने-आप गल गये । जबकि चण्डिका आकाश में नाच रही थीं, सबके सब भूत-प्रेत शवपर लपटे थे, देववृन्द पर्वत के शिखरपर बैठकर देवी का नृत्य देख रहा था, उस समय सारे भुवन की जो स्थिति हुई वह बड़ी दयनीय थी । उसकी सब दिशाएँ खण्ड-खण्ड करके खाये जा रहे, ले जाये जा रहे दुर्गन्धिपूर्णं मांस, वसा आदि से व्याप्त थीं, रक्त से सने हुए मेघखण्डों से खैर और अग्नि के समान सारा भुवन लाल दिखाई देता था। माँस चबाने की जल्दी से चारों ओर चब्‌ चब्‌ शब्द हो रहा था, लता जेसी लम्बी-लम्बी नसों और हड्डियों के टुकड़े करने से आकाश में कट-कट शब्द फैला था, भूतो के एक जगह इकट्ठा होने ओर अलग-अलग होने के कारण चारों ओर भीषण ध्वनि हो रही थी, सारा भुवन हिमालय ओर विन्ध्य पर्वत जैसे बड़े-बड़े हड्डियों के पहाड़ों से भरा था। देवी के मुँह से निकल रही अग्नि की ज्वाला में खूब पके हुए माँस से सारा-का-सारा भूतल व्याप्त था ओर रुधिर-कणरूपी ओस की बूँदों से सभी दिशाएँ सिन्दूर से सनी हुई सी हो गई थी । चारों ओर से देखनेवाले देवताओं से दिगन्तर चहारदिवारी से धिरा-सा हो गया था। कुछ पहाड़ तो चोटी तक पृथ्वी के अन्दर धँस गये थे ओर बचे खुचे शेष सबके सब हड्डियों से चोटियों तक छिप गये थे, अतएव भुवनो के सभी पर्वत अत्यन्त तिरोहित हो गये थे। दिशारूपी नायिकाएँ रुधिर से सने हुए मेघमण्डल से रक्तवस्त्र से ढकी हुई-सी मालूम पडती थी । गोल-मटोल ओर चंचल भुजाओं से घुमाये गये विविध हथियारों से आकाश सारा का सारा पट गया, नगर गाँव और कसबे सबके सब ध्वस्त हो गये थे, केवल उनकी स्मृति ही शेष रह गई थी । भुवन में सारे चराचर जगत्‌ का रूप ही अत्यन्त असंभव हो गया था, सारे जगत्‌ में सर्वत्र कूष्माण्ड ओर पिशाचिनियों का ही एकमात्र समाज हो गया था । पिशाचो द्वारा ताने वाने बनाये गये ओंतडीरूपी तन्तु ओं से, जो नाचने में जी जान से लगे हुए भूत, प्रेत ओर पिशाचो के अभिनयशील हाथों के आकार के (अभिनयशील हस्तरूपी) पक्षियों को फँसाने के लिए फेलाए हुए जाल के समान और आकाश में द्वितीय जगत्‌ की रचना कर रहे ब्रह्मा के नापने के सूतो के जैसे भूमि से लेकर सूर्य मार्ग तक ऊपर नीचे ओर दस दिशारूपी झाड़ियों से तिरछे लगे थे, ब्रह्माण्ड के उदरगत विमान के समान त्रैलोक्य हो गया था । भूतपूर्व पृथ्वीपर जमी हुई रुधिरधाराओं से समुद्राकार बने हए अतएव पूर्वोक्त उपद्रव से विक्षुब्ध जगत्‌ की वैसी हालत देखकर सात द्वीपों के छोर पर उक्त शव के कुत्सित अंगों से अस्पृष्ट लोकालोक पर्वत के शिखरपर बैठे हुए देवगण अति खिन्न हुए