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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 125

एक सौ तेईसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चोबीसवाँ सर्ग एक जीव का देहभेदों से विभिन्न व्यवहार का समर्थनपूर्वक द्वीपों में विभिन्‍न शैलों में विपश्चितों के विहार का वर्णन ।

12 verse-groups

  1. Verse 1चारों विपश्चितों की एक ही देह थी और एक ही जीव था। ऐसी अवस्था में उनमें भिन्‍न-भिन्‍न इच्छ…
  2. Verses 2–3एक जीव की भी अविद्यावश स्वप्न में नाना शरीर कल्पना देखी जाती है और उनमें शत्रुता, मित्रता…
  3. Verse 4जगत्‌ भी वस्तुतः चित्‌ ही है, उससे अतिरिक्त कुछ नहीं है। ऐसी स्थिति में चित्‌ का ही चित्‌…
  4. Verse 5अतएव अध्यस्त भोग्य जगदाकारः ब्रह्म विषय और इन्द्रियों का संयोग होने पर बुद्धि अवच्छिन्न ज…
  5. Verse 6एक ही वस्तु नाना ओर अनाना दोनों हो यह विरुद्ध है, माया द्वारा भी वह नाना ओर अनाना कैसे हो…
  6. Verse 7इसी कारण विपश्चितों के नाना दिशाओं में भोगयोग्य पदार्थो के एक ही समय भोग देनेवाले कर्म का…
  7. Verse 8जब अगस्त्य आदि योगियों का भी, जो मलय आदि नियत प्रदेश में नित्य रहते हैं, नाना देशों में अ…
  8. Verse 9विभिन्‍न-विभिन्‍न प्रदेशों में एक ही समय में एक की भिन्न क्रियाकारिता में तत्‌-तत्‌ देशों…
  9. Verse 10अणिमा आदि एश्वर्य की प्राप्ति से ईश्वरतुल्य हुए योगी एक ही समय में असंख्य कर्मपूर्ण जगतों…
  10. Verse 11एक ही विष्णु भगवान्‌ अपनी चार भुजाओं से अथवा अपने विभिन्‍न शरीरों से कहीं पर योगनिद्रा, क…
  11. Verses 12–23समुद्रो के तटों में तथा नगरिया में क्रीडा की । पूर्वं दिशा को प्रस्थित विपश्चित्‌ शाकद्वी…
  12. Verses 24–74जिस वस्तु का अवलम्बन कर उसने विद्याधरता प्राप्त की, उसे कहते हैं। सुरत में होनेवाले परिश्…