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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 125, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 125, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 125 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । वर्षे शान्तभयाभिख्ये जलधारे गिरौ तरौ । तादृक्कर्तरिपानीयं शाकद्वीपे पिबन् स्थितः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

चारों विपश्चितों की एक ही देह थी और एक ही जीव था। ऐसी अवस्था में उनमें भिन्‍न-भिन्‍न इच्छाएँ कैसे हुई ? श्रीरामचन्द्रजी ऐसी शंका करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : गुरुवर एक साक्षिचैतन्‍्यमय तथा एक ही शरीर के चार विभाग होने से एक शरीरवाले वे सब विपश्चित, जिनका एक ही जीव था, जीवभेद के बिना एक ही समय विविध इच्छावाले कैसे हो गये २

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ तेईसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चोबीसवाँ सर्ग एक जीव का देहभेदों से विभिन्न व्यवहार का समर्थनपूर्वक द्वीपों में विभिन्‍न शैलों में विपश्चितों के विहार का वर्णन ।